MP Special Story: मध्यप्रदेश का अनोखा गांव, जहां दीपावली पर भी घरों में नहीं होता रंग-रोगन, काले रंग की वस्तुओं के इस्तेमाल पर भी रोक
MP Special Story: दीपावली का त्योहार आते ही लोग अपने घरों की साफ-सफाई के साथ रंग-रोगन और सजावट में जुट जाते हैं, लेकिन मध्यप्रदेश के कछालिया गांव में ऐसा नहीं होता. रतलाम जिले के आलोट क्षेत्र में बसे इस गांव में दीपावली ही नहीं, बल्कि किसी भी मांगलिक अवसर पर घरों की दीवारों पर रंग नहीं किया जाता. गांव में नया मकान बने या पुराना हो, उसकी दीवारों को बिना रंग-रोगन के ही रखा जाता है. ग्रामीण इस परंपरा को गांव के काल भैरव यानी कालेश्वर भगवान मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यता बताते हैं.

1200 की आबादी वाले गांव में वर्षों से निभाई जा रही परंपरा
आलोट-जावरा मार्ग पर देहरी फंटे से करीब दो किलोमीटर अंदर स्थित कछालिया गांव में 300 से अधिक कच्चे और पक्के मकान हैं. यहां की आबादी लगभग 1200 है. दीपावली नजदीक होने के बावजूद गांव में किसी भी घर पर रंगाई-पुताई की तैयारी नहीं दिखाई देती. ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है और आज भी गांव के लोग इसका पालन करते हैं.
बुजुर्ग पुजारियों ने भी नहीं देखा घरों पर रंग-रोगन
गांव के करीब 80 वर्षीय पुजारी नाथूपुरी गोस्वामी और मोहनपुरी के अनुसार, उन्होंने अपने जीवन में किसी भी ग्रामीण को घर पर रंग-रोगन कराते नहीं देखा. उनका कहना है कि गांव में केवल सरकारी भवनों और काल भैरव मंदिर पर ही रंग किया जाता है. मंदिर में पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी हर साल अलग-अलग पुजारियों को सौंपी जाती है. ग्रामीण इस परंपरा को धार्मिक आस्था और पूर्वजों की मान्यता से जोड़कर देखते हैं.

काले कपड़े, जूते और मोजे पहनने से भी परहेज
कछालिया गांव की पहचान केवल घरों पर रंग-रोगन नहीं कराने तक सीमित नहीं है. यहां काले रंग की वस्तुओं के इस्तेमाल को लेकर भी विशेष परंपरा है. सरपंच प्रतिनिधि जगदीशपुरी के मुताबिक, ग्रामीण काले कपड़े, जूते, मोजे और बेल्ट जैसी चीजों का उपयोग नहीं करते. इसके अलावा पानी भी छानकर नहीं पीते हैं. गांव में विवाह के दौरान दूल्हा घोड़ी पर बैठकर मंदिर के सामने से नहीं गुजरता और शादी के अवसर पर घरों की दीवारों पर सजावटी डिजाइन भी नहीं बनाई जाती.

प्रधानमंत्री आवास योजना के मकानों पर भी नहीं हुआ रंग
गांव में सरकारी योजनाओं के तहत बने मकानों में भी इस परंपरा का पालन किया जा रहा है. रोजगार सहायक शांतिलाल के मुताबिक, प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत गांव में करीब 50 मकानों का निर्माण हुआ है, लेकिन इन घरों पर भी ग्रामीणों ने रंग-रोगन नहीं कराया. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कछालिया में यह परंपरा कितनी गहराई से लोगों के जीवन का हिस्सा बनी हुई है.
दूर-दूर से पहुंचते हैं श्रद्धालु
कछालिया गांव का काल भैरव मंदिर आसपास के क्षेत्रों में भी आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है. ग्रामीणों के अनुसार, मंदिर में दर्शन और मन्नत मांगने के लिए इंदौर, उज्जैन, मंदसौर और रतलाम सहित कई शहरों से श्रद्धालु पहुंचते हैं. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है. विशेष रूप से भैरव पूर्णिमा के अवसर पर मंदिर में बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ जुटती है. यही धार्मिक आस्था और वर्षों पुरानी मान्यताएं कछालिया गांव को प्रदेश के दूसरे गांवों से अलग पहचान देती हैं.
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Author: Vindhya Times
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