CG News: गढ़सिलियारा की अनदेखी विरासत, बरगद के नीचे प्राचीन गणेश-शिवलिंग और पुराने लोहे के नगाड़े

CG News: गढ़सिलियारा की अनदेखी विरासत, बरगद के नीचे प्राचीन गणेश-शिवलिंग और पुराने लोहे के नगाड़े

CG News: गढ़सिलियारा की अनदेखी विरासत, बरगद के नीचे प्राचीन गणेश-शिवलिंग और पुराने लोहे के नगाड़े

CG News: बस्तर की आदिवासी संस्कृति और परंपराओं के बीच केशकाल क्षेत्र का गढ़सिलियारा अपनी पुरानी विरासत के कारण खास पहचान रखता है. गांव में धार्मिक स्थलों के साथ कई ऐसे पुरावशेष मौजूद बताए जाते हैं, जो स्थानीय इतिहास और लोकविश्वास से जुड़े हैं. हालांकि, व्यवस्थित सर्वेक्षण और दस्तावेजीकरण के अभाव में इन धरोहरों के संरक्षण को लेकर चिंता बनी हुई है.

ग्राम देवी स्थल से जुड़ी गहरी आस्था

गढ़सिलियारा के ग्राम देवी-देवता स्थल पर मां मावली यानी दंतेश्वरी का पवित्र स्थान है. स्थानीय ग्रामीणों की इस स्थल से गहरी धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है. इसी क्षेत्र के आसपास मौजूद पुराने अवशेष गांव की सांस्कृतिक पहचान को और महत्वपूर्ण बनाते हैं. स्थानीय मान्यताओं के साथ इन स्थलों के ऐतिहासिक पहलुओं की भी जांच की जरूरत बताई जा रही है.

ancient statues and iron drums

बरगद के नीचे प्राचीन गणेश और शिवलिंग

ग्राम देवी-देवता स्थल से लगे तालाब की पूर्व दिशा में बरगद के पेड़ के नीचे भगवान गणेश और शिवलिंग की प्राचीन प्रतिमाएं मौजूद हैं. ग्रामीण इन्हें धार्मिक आस्था के साथ गांव की पुरानी विरासत का हिस्सा मानते हैं. प्रतिमाएं वास्तव में कितनी पुरानी हैं और इनका ऐतिहासिक महत्व क्या है, यह स्पष्ट करने के लिए पुरातत्व विशेषज्ञों की ओर से वैज्ञानिक सर्वेक्षण जरूरी होगा.

पुराने लोहे के नगाड़ों से जुड़ी लोककथा

गांव के पूर्वी हिस्से में दो पुराने लोहे के नगाड़े भी मौजूद बताए जाते हैं, जिनकी स्थिति अब जर्जर हो चुकी है. इनके संबंध में स्थानीय स्तर पर एक किवदंती प्रचलित है कि गढ़ के समय इन्हें बजाने पर इनकी आवाज करीब 40 कोस दूर तक सुनाई देती थी. यह दावा फिलहाल लोककथा का हिस्सा है, जिसकी ऐतिहासिक पुष्टि के लिए विशेषज्ञ जांच आवश्यक है. इन नगाड़ों का अध्ययन क्षेत्र के पुराने सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को समझने में मदद कर सकता है.

संरक्षण से खुल सकता है सांस्कृतिक पर्यटन का रास्ता

स्थानीय स्तर पर माना जा रहा है कि गढ़सिलियारा के धार्मिक स्थलों और पुरावशेषों का सर्वेक्षण, सत्यापन और दस्तावेजीकरण कराया जाए तो क्षेत्र को सांस्कृतिक पर्यटन से जोड़ा जा सकता है. इसके लिए सड़क, प्रकाश, पेयजल, स्वच्छता और सूचना-पट्ट जैसी बुनियादी सुविधाओं के साथ स्थानीय ग्रामीणों की भागीदारी भी जरूरी होगी. इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों की मदद से पहले वास्तविक धरोहरों की पहचान की जाए, इसके बाद संरक्षण की योजना बनाई जाए, ताकि गढ़सिलियारा की विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सके.

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Vindhya Times
Author: Vindhya Times

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