Sidhi News: सीधी में प्राचीन हाथी पूर्वजों के जीवाश्म मिले, वैज्ञानिकों ने बड़ी खोज का संकेत दिया
Sidhi News: सीधी जिले के सिहावल ब्लॉक के कोरौली कला गांव की अतरैला पहाड़ी में वैज्ञानिकों को प्राचीन हाथियों के पूर्वज (प्रोबोसिडियन) के जीवाश्म अवशेष मिले हैं। शुरुआती जांच में इनकी उम्र 25 हजार से ढाई लाख वर्ष पुरानी होने का अनुमान लगाया गया है।
वैज्ञानिक टीम ने किया स्थल का निरीक्षण
पीएमश्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, सतना की वैज्ञानिक टीम ने इस क्षेत्र का दौरा कर प्रारंभिक सर्वेक्षण किया। टीम का नेतृत्व प्राणी शास्त्र विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. हर्षित सोनी ने किया, जिनके साथ डॉ. ऋषभ देव साकेत और पुरातत्वविद डॉ. धीरेंद्र शर्मा भी मौजूद रहे। निरीक्षण के दौरान उन्हें बड़े आकार के शाकाहारी जीवों के दांतों के टुकड़े और अस्थि अवशेष मिले। इन साक्ष्यों ने इस स्थान को वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना दिया है।

दांतों की संरचना से मिला अहम संकेत
मिले हुए जीवाश्मों में दांतों की संरचना विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है। इनमें एनामेल प्लेट, डेंटिन और घिसाव के स्पष्ट निशान पाए गए हैं। ये सभी संकेत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि यह अवशेष प्राचीन प्रोबोसिडियन प्रजाति से जुड़े हो सकते हैं। इस तरह की संरचना आमतौर पर हाथी कुल के जीवों में पाई जाती है। इससे वैज्ञानिकों को प्रारंभिक पहचान में मदद मिली है।
प्राचीन मिट्टी और पर्यावरण के मिले प्रमाण
स्थल पर कठोर अवसादी मिट्टी के टुकड़े भी मिले हैं, जिनमें पौधों की जड़ों के निशान और सूक्ष्म संरचनाएं दिखाई देती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ये पैलियोसोल यानी प्राचीन मिट्टी के संकेत हो सकते हैं। इससे उस समय के पर्यावरण और जलवायु को समझने में मदद मिल सकती है। प्रारंभिक जांच से यह क्षेत्र सोन नदी घाटी के प्राचीन अवसादी निक्षेपों से जुड़ा हुआ माना जा रहा है।
उम्र निर्धारण के लिए उन्नत तकनीक जरूरी
वैज्ञानिकों का कहना है कि इन जीवाश्मों की सटीक उम्र जानने के लिए यूरेनियम डेटिंग की आवश्यकता होगी। फिलहाल डीएनए परीक्षण और कार्बन डेटिंग संभव नहीं है। ईएसआर तकनीक से भी पूरी तरह पुष्टि नहीं हो सकती है। इसके लिए विस्तृत भूवैज्ञानिक अध्ययन और तुलनात्मक विश्लेषण जरूरी होगा। इससे खोज की वैज्ञानिक पुष्टि और मजबूत हो सकेगी।
रिसर्च की संभावनाएं बढ़ीं
वैज्ञानिकों ने जिला प्रशासन से इस महत्वपूर्ण स्थल को जल्द से जल्द संरक्षित करने की अपील की है। उनका कहना है कि स्थानीय गतिविधियों के कारण कुछ जीवाश्म क्षतिग्रस्त भी हुए हैं। यदि समय रहते संरक्षण नहीं किया गया, तो यह अमूल्य धरोहर नष्ट हो सकती है। भविष्य में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध के लिए यह स्थल बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
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Author: Vindhya Times
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