Special Story: मध्य प्रदेश के इस जिले में रावण को मानते हैं जमाई राजा, 300 साल पुरानी परंपरा में मंदोदरी को मिला बेटी का दर्जा
Special Story: देशभर में 20 अक्टूबर को विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा. यह त्योहार बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक माना जाता है. इस दिन ज्यादातर जगहों पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में इससे अलग परंपरा देखने को मिलती है. यहां रावण की पूजा की जाती है और उसकी पत्नी मंदोदरी को बेटी के रूप में सम्मान दिया जाता है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मंदसौर के खानपुरा गांव को मंदोदरी का मायका माना जाता है, जबकि रावण को यहां जमाई राजा का दर्जा प्राप्त है.

मंदोदरी को बेटी और रावण को मानते हैं जमाई
खानपुरा में मंदोदरी को अपने गांव की बेटी मानने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है. लोककथाओं के मुताबिक, मंदोदरी का जन्म राजा मयासुर और अप्सरा हेमा के यहां हुआ था. गांव का नामदेव समाज इस मान्यता और परंपरा को आज भी निभा रहा है. इसी वजह से यहां रावण को केवल लंकापति के रूप में नहीं, बल्कि परिवार के दामाद के तौर पर भी देखा जाता है.
दशहरे पर 51 फीट ऊंची प्रतिमा की होती है पूजा
विजयादशमी के दिन खानपुरा में स्थापित रावण की 51 फीट ऊंची प्रतिमा के सामने श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं. नामदेव समाज के लोग ढोल-नगाड़ों के साथ प्रतिमा स्थल पर पहुंचते हैं और सामूहिक रूप से धार्मिक अनुष्ठान करते हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार, यह परंपरा करीब 300 वर्षों से चली आ रही है. यहां रावण को जमाई राजा और मंदोदरी को गांव की बेटी मानने की मान्यता का विशेष महत्व है. इसी परंपरा के चलते महिलाएं रावण की प्रतिमा के सामने से गुजरते समय घूंघट करती हैं.
रावण के दाएं पैर में मौली बांधने की मान्यता
खानपुरा में रावण की प्रतिमा से जुड़ी एक अन्य मान्यता भी प्रचलित है. लोगों का विश्वास है कि प्रतिमा के दाएं पैर में मौली या धागा बांधने से बीमारियों से राहत मिलती है. इसी आस्था के चलते दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग यहां पहुंचते हैं. श्रद्धालु रावण के पैरों में लच्छा बांधकर अपने जीवन में आने वाली परेशानियों और विपत्तियों को दूर करने की प्रार्थना करते हैं. हालांकि, यह स्थानीय धार्मिक मान्यता है.
प्रतिमा के दसवें सिर पर गधे का चेहरा
खानपुरा में रावण की प्रतिमा अपने एक खास स्वरूप के कारण भी चर्चा में रहती है. इसमें नौ सिर मनुष्य के हैं, जबकि दसवें सिर पर गधे का चेहरा बनाया गया है. स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित मान्यता के अनुसार, रावण शुरुआत में अत्यंत विद्वान था, लेकिन अंत में उसकी बुद्धि गधे जैसी हो गई थी. इसी धारणा को प्रतिमा के दसवें सिर के जरिए दर्शाया गया है. खानपुरा की यह परंपरा दशहरे पर रावण को लेकर देश के दूसरे हिस्सों में प्रचलित रीति-रिवाजों से अलग पहचान रखती है.
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Author: Vindhya Times
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