CG News: 600 साल पुरानी परंपरा का गोंचा महापर्व, तुपकी से भगवान जगन्नाथ को दी जाएगी विशेष सलामी

CG News: 600 साल पुरानी परंपरा का गोंचा महापर्व, तुपकी से भगवान जगन्नाथ को दी जाएगी विशेष सलामी

CG News: 600 साल पुरानी परंपरा का गोंचा महापर्व, तुपकी से भगवान जगन्नाथ को दी जाएगी विशेष सलामी

CG News: छत्तीसगढ़ के बस्तर में 16 जुलाई को भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के साथ ऐतिहासिक गोंचा महापर्व पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा. ओडिशा के पुरी की परंपरा से प्रेरित यह आयोजन बस्तर की आदिवासी संस्कृति, लोक परंपराओं और भगवान जगन्नाथ की भक्ति का अनूठा संगम माना जाता है. हर वर्ष हजारों श्रद्धालु इस पर्व में शामिल होने के लिए बस्तर पहुंचते हैं.

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600 वर्षों से निभाई जा रही है परंपरा

गोंचा महापर्व का इतिहास करीब 600 वर्ष पुराना माना जाता है. समय के साथ यह आयोजन बस्तर की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है. भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की पूजा-अर्चना के साथ कई धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, लेकिन इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता पारंपरिक तुपकी है, जो इसे देश के अन्य रथयात्रा आयोजनों से अलग पहचान देती है.

तुपकी से दी जाती है विशेष सलामी

तुपकी बांस से बनाई जाने वाली पारंपरिक बंदूक होती है, जिसे स्थानीय आदिवासी कारीगर तैयार करते हैं. रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ को तुपकी की आवाज के साथ सम्मान स्वरूप विशेष सलामी दी जाती है. इस परंपरा को 21 तोपों की सलामी के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. आयोजन समिति के अनुसार, इस वर्ष करीब 100 युवा तुपकी के माध्यम से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को गार्ड ऑफ ऑनर देंगे.

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ग्रामीणों की आजीविका से भी जुड़ी है तुपकी

गोंचा महापर्व से पहले ग्रामीण क्षेत्रों में तुपकी बनाने का कार्य शुरू हो जाता है. बांस से तैयार इन तुपकियों को रंग-बिरंगे कागज और सजावटी सामग्री से आकर्षक रूप दिया जाता है. महापर्व के दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण इनकी बिक्री करते हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय का अवसर मिलता है. इस तरह यह परंपरा स्थानीय कारीगरी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देती है.

आस्था और आदिवासी संस्कृति का जीवंत उत्सव

गोंचा महापर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है. रथयात्रा के दौरान ढोल, नगाड़ों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच भगवान जगन्नाथ की आराधना की जाती है. वहीं तुपकी से दी जाने वाली सलामी इस आयोजन को विशेष और यादगार बनाती है, सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी बस्तर की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को जीवंत बनाए हुए है. भगवान जगन्नाथ की भक्ति, आदिवासी लोक परंपराओं और स्थानीय शिल्पकला का अनूठा संगम गोंचा महापर्व को देश के सबसे विशिष्ट धार्मिक आयोजनों में शामिल करता है. यही वजह है कि हर वर्ष यह पर्व देश-दुनिया के श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है.

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Vindhya Times
Author: Vindhya Times

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