Rewa News: रीवा के टीकर वन क्षेत्र में बाक्साइट खनन को मिली सशर्त मंजूरी, पर्यावरण पर बड़ा खतरा

Rewa News: रीवा के टीकर वन क्षेत्र में बाक्साइट खनन को मिली सशर्त मंजूरी, पर्यावरण पर बड़ा खतरा

Rewa News: रीवा के टीकर वन क्षेत्र में बाक्साइट खनन को मिली सशर्त मंजूरी, पर्यावरण पर बड़ा खतरा

Rewa News: रीवा जिले के टीकर वन क्षेत्र में बाक्साइट खनन के लिए केंद्र सरकार ने सशर्त मंजूरी दे दी है। इस फैसले के बाद क्षेत्र के घने जंगल और वन्यजीवों के सुरक्षित आवास पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है। जहां सरकार इसे औद्योगिक विकास की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं पर्यावरणविद और स्थानीय लोग इसे प्राकृतिक धरोहर के विनाश की शुरुआत मान रहे हैं।

31 हेक्टेयर वन भूमि पर होगा खनन

जानकारी के अनुसार, मध्य प्रदेश शासन की सिफारिश के बाद केंद्र सरकार ने प्रस्ताव को मंजूरी दी है। इसके तहत कटनी मिनरल्स प्राइवेट लिमिटेड को लगभग 31.416 हेक्टेयर (करीब 75 एकड़) वन भूमि खनन के लिए आवंटित की जाएगी। इसमें से लगभग 28.079 हेक्टेयर क्षेत्र में सीधे बाक्साइट उत्खनन होगा, जबकि करीब 3 हेक्टेयर भूमि परिवहन मार्ग के रूप में उपयोग की जाएगी।

हजारों पेड़ों की कटाई का खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि खनन परियोजना के कारण लगभग 4,000 से 6,000 पेड़ों की कटाई हो सकती है। यह केवल पेड़ों का नुकसान नहीं होगा, बल्कि पूरे क्षेत्र की जलवायु, भूजल स्तर और जैव-विविधता पर भी दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा।

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वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर संकट

टीकर वन क्षेत्र मध्य भारत की जैव-विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यहां हाथियों का एक जोड़ा नियमित रूप से विचरण करता है, जबकि बाघों और तेंदुओं की मौजूदगी भी दर्ज की गई है। इसके अलावा हिरण, नीलगाय और जंगली सूअर जैसे कई वन्यजीव भी इस क्षेत्र में पाए जाते हैं, खनन शुरू होने से विस्फोट, मशीनों की आवाज और मानव गतिविधियों के बढ़ने से इन वन्यजीवों का प्राकृतिक व्यवहार प्रभावित होने की आशंका है।

मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार, जब जंगलों का क्षेत्र घटता है तो वन्यजीव भोजन और आश्रय की तलाश में मानव बस्तियों की ओर बढ़ते हैं। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ सकती हैं, जो पहले से ही इस क्षेत्र में चिंता का विषय रही हैं।

स्थानीय लोगों और पर्यावरणविदों की चिंता

स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह परियोजना जंगल, जल स्रोत और ग्रामीण आजीविका पर गंभीर असर डालेगी। उनका सवाल है कि जब खनिज यहां से निकलेगा और मुनाफा कंपनियों को मिलेगा, तो स्थानीय लोगों को वास्तविक लाभ क्या होगा?

विकास बनाम पर्यावरण की बहस तेज

यह मामला एक बार फिर विकास और पर्यावरण के बीच बहस को सामने ला रहा है। एक ओर इसे रोजगार और औद्योगिक विकास का अवसर बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे प्राकृतिक संतुलन के लिए खतरा माना जा रहा है।

क्या सशर्त मंजूरी पर्याप्त होगी?

हालांकि सरकार ने खनन की अनुमति सशर्त दी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन शर्तों का सही ढंग से पालन हो पाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि निगरानी कमजोर रही तो यह जंगल धीरे-धीरे खत्म हो सकता है।

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Author: Vindhya Times

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