MP News: उज्जैन के प्राचीन मंदिरों का होगा वैज्ञानिक तरीके से जीर्णोद्धार

MP News: उज्जैन के प्राचीन मंदिरों का होगा वैज्ञानिक तरीके से जीर्णोद्धार

MP News: उज्जैन के प्राचीन मंदिरों का होगा वैज्ञानिक तरीके से जीर्णोद्धार

MP News: देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल महाकालेश्वर मंदिर और उसके आसपास स्थित प्राचीन मंदिरों के संरक्षण एवं जीर्णोद्धार के लिए 7 करोड़ 41 लाख रुपये की परियोजना तैयार की गई है। मंदिर की ऐतिहासिक, धार्मिक और स्थापत्य महत्व को ध्यान में रखते हुए यह कार्य आधुनिक तकनीक और पारंपरिक संरक्षण पद्धतियों के मिश्रण से किया जाएगा।

CBRI ने जारी किए तकनीकी दिशा-निर्देश

मंदिर परिसर के संरक्षण कार्य के लिए Central Building Research Institute (CBRI) ने तकनीकी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन्हीं मानकों के आधार पर स्ट्रक्चरल रिपेयर और रिहैबिलिटेशन कार्य के लिए एजेंसियों के चयन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय से मौसम के प्रभाव, जल रिसाव और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आवाजाही के कारण मंदिर परिसर की कई संरचनाओं में दरारें और क्षति दिखाई दे रही थी।

Mahakal Temple

मौसम और जल रिसाव से बढ़ीं समस्याएं

अधिकारियों के मुताबिक, मंदिर के पत्थरों के जोड़ों का कमजोर होना, पुराने सीमेंट पैच का खराब होना और छतों में रिसाव जैसी समस्याएं सामने आई हैं, इन सभी हिस्सों का संरक्षण अब वैज्ञानिक पद्धति से किया जाएगा, ताकि मंदिर की मूल वास्तुकला और संरचनात्मक मजबूती लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सके, परियोजना के तहत गर्भगृह और अन्य हिस्सों से निकलने वाले अभिषेक जल के लिए आधुनिक वॉटरप्रूफ ड्रेनेज सिस्टम बनाया जाएगा, इसके निर्माण में बेसाल्ट पत्थरों का उपयोग किया जाएगा और बाहरी जल निकासी व्यवस्था को भी मजबूत किया जाएगा, ताकि भविष्य में जल रिसाव की समस्या कम हो सके।

हींग और नायलॉन ब्रश से होगी सफाई

मंदिर की प्राचीन संरचना को सुरक्षित रखने के लिए पत्थरों पर जमी काई और वनस्पतियों की सफाई रासायनिक पदार्थों से नहीं की जाएगी, इसके बजाय हींग के ऑर्गेनिक घोल और नायलॉन ब्रश का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे पत्थरों को नुकसान पहुंचाए बिना सफाई संभव हो सके।

आधुनिक तकनीक से मिलेगा सहारा

कोटि सरोवर कुंड, मंदिर की छतों और आरसीसी दीवारों में हो रहे रिसाव को रोकने के लिए आधुनिक वॉटरप्रूफिंग तकनीकों का उपयोग किया जाएगा, पुराने और क्षतिग्रस्त सीमेंट पैच हटाकर दरारों की मरम्मत चूना, सुर्खी और रेत के पारंपरिक मिश्रण से की जाएगी। वहीं कमजोर बीम और खंभों को मजबूत करने के लिए कार्बन फाइबर रीइन्फोर्स्ड पॉलिमर तकनीक का इस्तेमाल होगा।

विशेषज्ञों की निगरानी में होगा पूरा काम

मरम्मत कार्य के दौरान पूरे मंदिर परिसर में ट्यूबलर स्टील स्कैफोल्डिंग लगाई जाएगी, ताकि ऊंचाई वाले हिस्सों में सुरक्षित तरीके से काम किया जा सके, क्षतिग्रस्त पत्थरों की जगह नए तराशे गए बेसाल्ट पत्थर लगाए जाएंगे, जिससे मंदिर का मूल स्वरूप बरकरार रखा जा सके। पूरा कार्य इंजीनियरों और पुरातत्व विशेषज्ञों की निगरानी में किया जाएगा।

12 से 18 महीनों में पूरा होगा प्रोजेक्ट

प्रशासन ने इस पूरी परियोजना को 12 से 18 महीनों के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा है, चूना और सुर्खी आधारित पारंपरिक क्योरिंग प्रक्रिया के कारण अलग-अलग चरणों में 7 से 14 दिनों का समय लगेगा। साथ ही श्रद्धालुओं की दर्शन व्यवस्था प्रभावित न हो, इसके लिए कार्य चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा।

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Vindhya Times
Author: Vindhya Times

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